बाड़मेर। जिले में जिस खादी ने हजारों जरूरतमंदों को रोजगार दिया और राष्ट्रीय स्तर तक पहचान बनाई उसी खादी को सरकारी अघिकारियों व स्थानीय जनप्रतिनिघियों की अरूचि खा गई। खादी कमीशन के कार्यालयों में ताले लग रहे हैं। हजारो कतवारिनों व बुनकरो को रोजगार नहीं मिल रहा है। कोई जनप्रतिनिघि पैरवी नहीं कर रहा है। खादी कमीशन के पास जिले में करोड़ों की संपत्ति है लेकिन अघिकांश जगह कबूतरों की गुटरगूं सुनाई दे रही है।
पचास साल पहले जब जिले में रोजगार के साधनों का नितांत अभाव था। महिलाओं का घर से बाहर रोजगार करने जाना मुश्किल था और पिछड़े तबके के मजदूरों को कार्य नहीं मिल रहा था तब खादी जरूरतमंदों के रोजगार का सहारा बनी और खादी कमीशन के माध्यम से जिले में रोजगार प्रारंभ किया गया। खादी ने जिले में पांच हजार कतवारिनों और दो सौ बुनकरों को जोड़कर कार्य प्रारंभ किया जो संख्या निरंतर बढ़ती रही।
खादी के 11 केन्द्रों के माध्यम से रोजगार उपलब्ध करवाया जा रहा था, लेकिन करीब एक दशक पूर्व खादी को लेकर उपेक्षा प्रारंभ हो गई। खादी कमीशन में साठ और सत्तर के दशक में नियुक्त हुए कार्मिक सेवानिवृत्त होने लगे लेकिन इनकी जगह पर नए कार्मिकों को नियुक्त करने की बजाय केन्द्रों पर ताले लगा दिए गए। लिहाजा कतवारिनों और बुनकरों का रोजगार छिनता गया। जिले में जहां पूर्व में पांच हजार कतवारिनों को रोजगार मिल रहा था अब केवल पांच सौ कतवारिनों को ही रोजगार मिल रहा है।
केन्द्र बंद हुए
बिशाला, बालेबा, हरसाणी, गडरा, शास्त्रीग्राम, बंधड़ा, म्याजलार, बैकुण्ठग्राम, गूंगा, नाचना व बज्जू केन्द्र संचालित हो रहे थे इसमें से छह केन्द्र बंद हो गए है। अब केवल बिशाला, बालेबा, शास्त्रीग्राम, गूंगा और बैकुण्ठग्राम केन्द्र ही संचालित हो रहे है।
भवन हुए लावारिस
जिला मुख्यालय पर खादी कमीशन के लिए वर्ष 1989 में लाखों की लागत से भवन बनाया गया। इसमे सहायक निदेशक सहित कई पद भी स्वीकृत किए गए थे लेकिन इस भवन में अब केवल एक अघिकारी, एक लिपिक व एक कार्यकर्ता ही नियुक्त है। वहीं खादी कमीशन के जहां केन्द्र थे वहां पर भी लाखों की संपत्ति है लेकिन अब उसका कोई धणीधोरी नहीं है।
क्षेत्र को लाभ मिले
खादी कमीशन ने सीमावर्ती क्षेत्र में रोजगार दिया है और इसकी ओर जनप्रतिनिघि ध्यान दें तो यह जिले में महिलाओं के रोजगार का मुख्य जरिया बन सकता है।- ईश्वरसिंह सरपंच कोटड़ा
"http://www.patrika.com/news.aspx?id=325430">खादी को "खा" गई बेरूखी