उउजड़ी बस्तियों से आबादियां बोलती है.. जालोर। सुनने की मोहलत मिले, तो आवाज है पत्थरों में, कहीं उजड़ी हुई बस्तियों से आबादियां बोलती हैं। इन पक्तियों को सार्थक करता अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे जालोर के ऎतिहासिक स्वर्णगिरी दुर्ग का शनिवार को जिला प्रशासन ने जायजा लिया तथा यहां पर्यटन विकास की संभावनाएं तलाशी।जिला कलक्टर केवलकुमार गुप्ता व एसडीएम प्रदीप बालाच समेत प्रशासनिक अघिकारियों ने इस दुर्ग पर स्थित राजप्रासाद, पुरा सम्पदा, मंदिर, द्वार, बावडिया व वीरमदेव चौकी का अवलोकन किया। जिला कलक्टर व एसडीएम ने दुर्ग पर स्थित सभी धरोहरों को देखा तथा इनके जीर्णोद्धार की आवश्यकता जताई। साथ ही ऎतिहासिक दुर्ग की इस हालत पर चिंता भी जताई। शनिवार सवेरे कलक्टर व एसडीएम सहित अन्य अघिकारियों ने दुर्ग पर चढ़ना शुरू किया।चढ़ाई के दौरान उन्होंने सूरज पोल, ध्रुव पोल, चांद पोल व सिरे पोल की मजबूती व कारीगरी को देखा। साथ ही रास्ते में पड़ी तोपों का भी अवलोकन किया। इसके बाद सभी अघिकारियों ने प्रसिद्ध मानसिंह महल, वीरमदेव महल व इनमें स्थित बावडियों को भी देखा तथा इनकी शिल्पकला व कारीगरी को सराहा। इसके अलावा महल के पीछे स्थित शिव मंदिर, चामुण्डा माता मंदिर, कोलर बावड़ी की वर्तमान स्थिति को भी देखा। साथ ही उन्होंने वीरमदेव चौकी, जैन मंदिर, शाही दरगाह व मलिकशाह दातार की दरगाह का भी अवलोकन किया।बस इतनी शिकायत है...जालोर के इस ऎतिहासिक दुर्ग की वर्तमान स्थिति को सुधारने के लिए कई बार बडे नेताओं व अघिकारियों ने दौरे किए तथा योजनाओं की घोष्ाणा की, लेकिन कुछ भी नया नहीं हुआ है। दुर्ग की कई बड़ी योजनाएं इस समय अधर में लटकी हुई है। दुर्ग पर सड़क बनाने की योजना हो या मानसिंह के महज में म्यूजियम, पोलों के जीर्णोद्वार की बात हो या दुर्ग की सुरक्षा। ये सारी योजनाएं इस समय कागजों में सिमटी दम तोड़ रही है।अघिकारियों द्वारा बार-बार अवलोकन के बावजूद प्रशासन की ओर से इस दुर्ग में कोई खास काम नहीं करवाया गया। वर्ष 2006 में पर्यटन सहायक निदेशक उपेन्द्रसिंह शेखावत, उपखंड अघिकारी सुरेश नवल तथा वर्ष 2009 में जिला कलक्टर एस.एस. बिस्सा और एसडीएम ओ.पी. जैन ने भी दुर्ग का अवलोकन किया था। बिस्सा ने एक विस्तृत योजना भी दुर्ग के विकास के लिए बनाई थी, लेकिन आज वह फाइलों में ही दम तोड़ रही है।जड़ी बस्तियों से आबादियां बोलती है..